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Tuesday, October 18, 2022

(कहानी) अर्जुन की भटकन उसे निर्जन मन्दिर ले आई

जाने किस अपरिभाषित खोज में नगर-नगर, ग्राम-ग्राम भटकटे हुए आज अर्जुन किसी सुदूर घाट पर बैठा सूर्योदय देख रहा था। अब तक मंदिर में बज रही घंटी और आरती के स्वर कब पखावज की थाप में रूपांतरित हो चुके थे ये पता ही ना चला। कहाँ से आ रही थी ये थाप?

जहाँ घाट समाप्त होता है, उसी ओर, कुछ ही दूर, पुराना सा मंदिर... और मंदिर के प्रांगण में दो मानव आकृतियाँ – दो सिल्यूएट।

मंदिर के द्वार की सीढ़ियों की एक ओर बने चबूतरे पर बैठा कोई विरल सा पुरुष मृदंग से मानो यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित करने के प्रयत्न कर रहा हो। अभी गति धीमी थी... लौह-पथ-गामिनी अपने अगले गंतव्य की ओर यात्रा प्रारंभ कर ही रही थी।

दूसरी आकृति पखावज पर पड़ते हर थाप के साथ भंगिमा बदल रही थी। सूर्योदय के लोहित आकाश की पृष्ठभूमि पर जैसे पारद शब्द उकेर रहा हो – शब्द जो क्रमबद्ध-लयबद्ध हो पंक्तियाँ रच रहे हों और पंक्तियाँ कोई कविता। 

लौह-पथ-गामिनी द्रुत गति पकड़ चुकी थी। एक ओर यज्ञकुण्ड में धधकती अग्नि की लपटें किसी स्त्री का शरीर धारण कर मंदिर के प्रांगण में नृत्याभ्यास में लीन थी, दूसरी ओर उसी अग्नि का ताप पखावज के पानों से निगर्त हो रहा था – पखावज छंदबद्ध ऋचाओं का पाठ कर रहा था। सबकुछ तरल था और हर भंगिमा उस तरल में उठती तरंगें।

दूर-दूर तक कोई और इन्हें देखने-सुनने वाला नहीं था – गाँव इस निर्जन स्थान से दूर था। संयोगवश, अपनी भटकन में आज अर्जुन ने किसी सघन वन में खिले दिव्य पुष्प के दर्शन पा लिए थे।

सम्मोहन टूटा – नृत्यांगना पखावज वादक के समक्ष शशांकासन में बिछी भारी श्वास भर रही थी। वादक बिना कोई प्रतिक्रिया दिये, चुपचाप उठ, उस जीर्ण-शीर्ण मंदिर के भीतर चला गया। सूर्य अपने रथ पर आरूढ़, दसों दिशाओं में अपनी किरणों के रजत-तंतु बिखेर चुका था।
जून ४, २०१८
शशांकासन –