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Wednesday, October 5, 2022

पूर्वजों द्वारा शक्ति उपासना का उत्सव है दशहरा

अपनी भुजाओं की मछलियों को देख कर इतराते समय मन में कहीं कोई स्वर उठता है–"इदं न मम", और मैं मुस्कुरा उठता हूँ। 

दशहरे पर आयुध पूजन करते समय ध्यान आया कि आज सामने जो कुछ सजा था – ये लेखनी मम्मी की दी हुईं... ये मुद्गर दादाजी का दिया हुआ, और ये डम्बल पापा के हैं, जिन्हें पहली बार मैं ने ११वीं कक्षा में हाथ लगाया था...

बचपन में दादाजी को देखता था–सवेरे उठ कर छत पर योगाभ्यास करते थे। एक बार उनके अखाड़े में पुराने पट्ठों के भेंट-कार्यक्रम में मुझे साथ ले गए थे। मैं उनकी उँगली पकड़े वहाँ पहुँच कर सबकुछ देखता खड़ा था। कक्षा ५वीं में पापा का स्थानांतरण मुम्बई हुआ तो नागपुर पीछे छूट गया, पर यहाँ पापा को इन्हीं डम्बल से व्यायाम करते देखा था। 

आज जो कुछ मैंने पाया है, वह तीन पीढ़ियों और उससे अधिक के परिश्रम का फल है... सारे गुण, सारी सफलता, सारे सुख! मेरा क्या? 

योग-व्यायाम और इनके द्वारा गढ़े अनुशासन–ये उन वृक्षों समान हैं जिनके बीज एक पीढ़ी बोती है और आनेवाली पीढ़ियाँ उनके फल भोगती हैं। और यही बात संस्कृति के हर रंग-अङ्ग पर लागू होती है–ऐसे ही संस्कार-परम्पराएँ गढ़ी जाती हैं। 

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

दशहरे पर आयुध-पूजन और नवरात्रि शक्ति उपासना का पर्व... और इन दोनों के ठीक पहले पितृ-पक्ष!

शक्ति उपासना बिन बलि पूरी नहीं होती।

पित्तरों के अथक परिश्रम और उनके पारिवारिक हितों हेतु वैयक्तिक सुखों का बलिदान उनकी शक्ति उपासना थी... जिसका उत्सव उनके वंशजों के जीवन की विजया-दशमी!

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