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Sunday, October 9, 2022

अपनी पीठ पर अपना ही हाथ

मानस में तुलसी बाबा कहते हैं–
बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोई।
जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।।
तब महादेव ने भवानी से हँसकर कहा,"न कोइ ज्ञानी है, न ही कोई मूर्ख! श्री रघुनाथजी जब जिसको जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है।"

लोकमान्यता है कि मूढ़ से मूढ़ और पतित से पतित प्राणी की जिह्वा पर भी दिन में एक बार माँ सरस्वती विराजमान होती हैं; बचपन में एक बार नानी जी के यहाँ ऐसी घटना देखी कि उस दिन से मन में ये बात घर कर गई। बड़े भइया के साथ गाँव में मॉर्निंग वॉक पर निकला था। आज भी वह दृश्य स्मृति में ज्यों का त्यों है–रेलवे स्टेशन के लोहे के पुल पर हम चल रहे थे कि वहीं किनारे में सोए एक भिखारी को भइया ने "राम राम" किया। भइया स्वयं साधुवृत्ति के हैं–गाँव में हर किसी से बड़े प्रेम से मिलते हैं। हमारे वहाँ पहुँचने के समय ही मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटा, उलझी दाढ़ी-मूँछ वाला वह व्यक्ति उठ कर बैठा ही था। भइया की राम-राम का उत्तर दे कर बोला,

"भाई, मनुज पर चार पहर तीन गुणों का पहरा रहता है। हम किस समय कैसी बात करते हैं, हमारा कैसा व्यहार होता है, ये इस पर निर्भर करता है कि हमपर कौन सा गुण भारी है।"
सवेरे के ठण्डे झोंकों ने मेरी पलकें भारी कर रखीं थीं। मैं इस ताक में था कि कब घर पहुँचूँ और बिस्तर में घुस कर फिर से सो जाऊँ। पर इस भिखारी के मुँह से ऐसी ज्ञान की बात सुनते ही नींद उड़ गई। आँखें मींच कर देखा, तो वही घिनौना सा दिखने वाला भिखारी अपनी बात को उदाहरण दे कर विस्तार दे रहा था और मैं मूढ़मति समझने के प्रयास कर रहा था। झीने से अस्पष्ट शब्द स्मरण आते हैं–

"तुमने मुझ जैसे को राम राम किया, ये सतगुन का प्रभाव है..." 

आगे की बात स्मरण नहीं। इस अधूरी बात को सोच कर लगता है जैसे नासमझी में कोई बहुत बड़ी निधि हाथों से निकल गई।

इतना सब लिखने के पीछे की बात ये रही कि अपने पहचान में सब से पतित प्राणी की कही बात ही कई बार निराशा भरे क्षणों में ढाढ़स बंधा गई–

"हम तो हनुमान जी के भक्त हैं। भले चम्मच से ही क्यों ना पहाड़ खोदना पड़े, खोदेंगे अवश्य!"

अपने ही शब्द–अपनी ही पीठ पर अपना ही हाथ। कदाचित इन्हें कहीं लिखते समय माँ सरस्वती ने मुझ जैसे कुटिल-खल-कामी पर अपनी कृपानिधि उड़ेल दी थी। फटी झोली में क्या ही समेटाता... पर इस एक स्वर्णकण को अपनी अंजुली में जब भी देखता हूँ, इतराने से चूकता नहीं मैं।
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