"मैंने अपने हिस्से का दूध बचा के रखा था, उनके शब्दों में 'अन्धविश्वास के नाले' में गिराने के लिए; नही किया होता तो मेरे पेट में जाता ..... इसमें उम्मीद है आपत्ति नही होनी चाहिए किसी को .... और इन भूखों को कितने शिवलिंग पर दूध नही चढाने वालों ने दूध पिलाया है आज, ये तो मालूम नही मुझे ... आप ही बता दो मालूम हो तो" मेरे ह्रदय की उद्द्विग्न भावनाओं को अभिव्यक्ति देते ये शब्द हैं कविवर प्रकाश 'पंकज' के।
शिवरात्रि पर दूध की बर्बादी, शनिवार को तेल की बर्बादी, पूजा-पाठ में अक्षत के रूप में चांवल की बर्बादी, दिवाली में पटाखों से ध्वनि-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण और पैसों की बर्बादी, होली में पानी की बर्बादी ... अरे भाई साँस लेने पर भी कुछ बोल दीजिये, है तो आखिर ऑक्सीजन की बर्बादी ही न !
अगर मैं भगवन शंकर को दूध चढ़ाता हूँ तो वो इस विश्वास के साथ की प्रभु इस धरती पर सब पर कृपा करेंगे । " ॐ नमः शिवाय" मंत्र के बाद "सर्वे भवन्तु सुखिनः ..." भी कहता हूँ। मेरी प्रार्थना में वे दरिद्र-नारायण भी शामिल हैं जिनका उल्लेख आपने मेरी आस्था की आलोचना में किया था। मेरे विश्वास को गाली देने का अधिकार किसने आपको दिया? अगर आप इतने ही आदर्शवादी हैं तो पहले जाइये उन कटती गौ माताओं को बचाइए ... जाइये ईद पर कटते बकरों को बचाइए। दिवाली से कहीं अधिक ध्वनि और वायु प्रदुषण न्यू इयर मनाने में कर जाते हैं लोग, पहले उन्हें रोकिये। वलेंटाइन डे पर फूलों, कार्डों और पैसों की बर्बादी नहीं दिखती आपको? बात यहाँ केवल आदर्शवाद की ही नहीं, अपितु असहिष्णुता की भी है ... विश्वास की भी है। केवल मेरे धार्मिक विश्वासों पर ही प्रश्नचिन्ह क्यों?
आशा करता हूँ की आपको ये ज्ञात होगा की भीख मांगना भी एक दंडनीय अपराध है। विश्वास न हो तो ये लिंक देख लीजिये - THE BOMBAY PREVENTION OF. BEGGING ACT, 1959 क्या इसका मतलब ये नहीं की भिखारियों को भीख देना अपराध में
भागीदार होने जैसा है।अगर ये दूध मैं शिवलिंग पर न चढ़ा कर भिक्षा में किसी को दे दूं , तो क्या ये उचित होगा? क्या मैं लोगों को मेहनत की रोटी कमाना छोड़ कर भीख मांगने के लिए प्रेरित नहीं करूँगा ऐसे में? इसपर क्या कहना चाहेंगे आप?कम से कम जब में दूध खरीदता हूँ तो एक मेहनतकश दूधवाले को उसके मेहनत का फल मिलता है ... उसके परिवार का खर्च चल पाता है। आप मेहनत या भीख की रोटी में से किसे चुनना पसंद करेंगे?
मेरी आपसे करबद्ध प्रार्थना है की ये खोखला आदर्शवाद आप अपने और अपने परिवारजनों की लिए ही सम्हाल कर रखें, इससे मुझे और मेरे प्रियजनों को दूषित करने का प्रयत्न न करें। मेरे भोले-भंडारी को आपके दूध न चढाने से कोई फर्क नहीं पड़ता, अपितु अगर आप सचमुच अपने आदर्शवाद का पालन कर हर शिवरात्रि किसी दीन-हीन के भूखे बच्चे को दूध पिलायेंगे तो मुझे पूर्ण विश्वास है की
भोले-बाबा आपसे अति प्रसन्न होंगे। तो घर बैठे आलोचना करना छोडिये और एक लोटा दूध खर्च कर आइये।
बम बम भोले ... हर हर महादेव
3 comments:
सीधे मन से निकली बात बिना लाग लपेट के :)
धन्यवाद कविवर। आपकी चरणधुली इस दीन की कुटिया (ब्लॉग) पर पड़ी, मैं धन्य हो गया :)
Very nicely put!!!
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