होली से ठीक एक दिन पहले मैं बाज़ार में पागलों की तरह भांग ढून्ढ रहा था। जहाँ-जहाँ मिलने की आशा थी पूछ लिया पर निराशा ही हाथ लगी। मन मार कर घर की ओर निकल लिया। 'शिकार के समय कुतिया हगाने' का यही परिणाम होता है! हमेशा काम में देरी। अब भुगतो!पता नहीं हम महाराष्ट्र की जनता ने क्या पाप किया है कि यहाँ भांग पर रोक लगी हुई है, जबकि राजस्थान में तो सरकारी भंग की दुकानें हुआ करती हैं। आप देश की सरकार चुनने के लिए वोट तो १ ८ साल कि आयु में डाल सकते हैं परन्तु मदिरापान की अनुमति २५ वर्ष की आयु से ही मिलेगी। इस आयु-सीमा के बावजूद हर गली-नुक्कड़ पर दारु की दुकान/बार दिख जायेंगे। सरकार धूम्रपान के हर दृश्य पर 'चेतावनी' दिखाने का नियम बना सकती है परन्तु दारु-शराब पर 'हमका पीनी है' और 'गिलासी' जैसे गानों पर कोई आपत्ति नहीं।
बस रोक है तो भांग पर! बेचारा सा भांग! सरकार को मदिरा/शराब जैसे मुनाफे कमा कर नहीं दे सकता ना! बाजारवाद की इस भागमभाग में इसी कारण पिछड़ कर दूर किसी जंगल में जा बैठा है। ...बस इसी उधेड़-बुन में होलिका दहन कर मैं सो गया। आज सवेरे खूब होली भी खेली ...पर भांग का खयाल मन से गया नहीं था।
होली खेल कर थके-हारे हम दोस्त-यार बैठे बात ही कर रहे थे कि इतने में किसी को खबर मिली की भांग कहाँ से लाया जा सकता है। बस फिर क्या था, सारे लौंडे अपनी-अपनी फटफटी (Bike) पर सवार हो निकल लिए। जानते हो कहाँ मिला भांग? एक पान की दूकान पर ..... जो की ठीक पुलिस थाने की बगल में था!जय हो भोलेनाथ ...तुम्हारी लीला अपरम्पार है! ;)
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