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Sunday, November 3, 2013

दिवाली और वॉचमैन का बेटा

॥श्री॥ 

पिछली दीपावली कि बात है। हमने तो नहीं ख़रीदे पर पापा को उनके किसी मित्र नें एक बड़ा बक्सा भर के पठाखे उपहार में दिए थे। बचपन कि बात और थी जब बिल्डिंग के मित्रों के साथ पटाखे फोड़ा करता था। अब कईयों कि नौकरी किसी और शहर में लग चुकी थी या फिर उन्होंने कहीं और घर ले लिया था। मेरे हमउम्र तो सारे जैसे गायब ही हो चुके थे। बस छुटके बच्चों को यहाँ से वहाँ फुलझड़ी लिए दौड़ते देख रहा था। अब पटाखे अकेले छुड़ाने में क्या मज़ा? दीवाली कि पूजा-पाठ कर के उठा तो मम्मी ने कुछ बचे हुए पटाखे मेरे हाथ में रख कर कहा कि आज के दिन कुछ तो पटाखे फोड़ने ही चाहिए। उन्होंने लगभग सारे पटाखे हमारे यहाँ की कामवाली दीदी को उनके बच्चों के लिए दे दिए थे और थोड़े से मेरे लिए बचा रखे थे। अब बच्चों के बीच में इतना बड़ा सांड पटाखे फोड़ते अच्छा थोड़े लगता है! पर मेरी माताश्री को कौन समझाए?

अनमना सा पटाखों कि थैली ले कर मैं बिल्डिंग के नीचे उतरा। सारे बच्चे पटाखों का आनंद उठा रहे थे।
नोबिन
मैं एक किनारे खड़े हो कर सब की मस्ती देखने लगा कि इतने में मेरी नज़र दूर खड़े वॉचमैन के ६-७ साल के बेटे पर पड़ी। किसी ने दो फुलझड़ियाँ दे दी थीं उसे, उसी में खुश हो गया… थोड़ी देर के लिए। फिर चुप खड़ा हो कर सब कि ओर ताकने लगा। कुछ सोचे बिना यूँ ही मैंने उसे आवाज़ लगा कर बुलाया और फुलझड़ी हाथ में थमा कर बोला "चल पटाखे फोड़ेंगे", आँखों में चमक आ गई छोकरे की! भाग कर अपने पिताजी के पास से दिया और माचिस ले आया और मेरे ही पास खड़ा हो कर फुलझड़ी जला कर उसे गोल गोल घुमाने लगा। खुशियां, हंसी और उत्साह बड़ी ही संक्रामक होती हैं - मुझे भी जोश आ गया। एक अनार निकाला और हो गयी रौशनी कि बरसात। अनार, सुतली बम, चक्र, फुलझड़ियाँ… हम दोनों ने मिल कर सब फूँक डाले। जब सारे पटाखे ख़तम हो गए तो लड़का उछल उछल कर तालियां बजा रहा था। इतने में कुछ और लोगों ने भी थोड़े से पठाखे उसे ला कर दे दिए। मैंने सोचा कि मेरा काम यहाँ ख़त्म , पर नहीं! लड़का सरे पटाखे ले कर मेरे पा दौड़ा आया और बोला "चलो न भैया, इनको भी फोड़ेंगे"…

आज तक शर्मीला सा चुपचाप सा 'नोबिन' अब रोज़ मेरे आते जाते मुझे आवाज़ ज़रूर लगाता है। मुट्ठी भर पटाखों के बदले ढेर सारी हंसी - सौदा बड़ा सस्ता था!
॥ शुभ दीपावली ॥

Wednesday, March 27, 2013

भांग कहाँ है ... कहाँ है भांग?

होली से ठीक एक दिन पहले मैं बाज़ार में पागलों की तरह भांग ढून्ढ रहा था। जहाँ-जहाँ मिलने की आशा थी पूछ लिया पर निराशा ही हाथ लगी। मन मार कर घर की ओर निकल लिया। 'शिकार के समय कुतिया हगाने' का यही परिणाम होता है! हमेशा काम में देरी। अब भुगतो!

पता नहीं हम महाराष्ट्र की जनता ने क्या पाप किया है कि यहाँ भांग पर रोक लगी हुई है, जबकि राजस्थान में तो सरकारी भंग की दुकानें हुआ करती हैं। आप देश की सरकार चुनने के लिए वोट तो १ ८  साल कि आयु में डाल सकते हैं परन्तु मदिरापान की अनुमति २५ वर्ष की आयु से ही मिलेगी। इस आयु-सीमा के बावजूद हर गली-नुक्कड़ पर दारु की दुकान/बार दिख जायेंगे। सरकार धूम्रपान के हर दृश्य पर 'चेतावनी' दिखाने का नियम बना सकती है परन्तु दारु-शराब पर 'हमका पीनी है' और 'गिलासी' जैसे गानों पर कोई आपत्ति नहीं।
बस रोक है तो भांग पर! बेचारा सा भांग! सरकार को मदिरा/शराब जैसे मुनाफे कमा कर नहीं दे सकता ना! बाजारवाद की इस भागमभाग में इसी कारण पिछड़ कर दूर किसी जंगल में जा बैठा है। ...बस इसी उधेड़-बुन में होलिका दहन कर मैं सो गया। आज सवेरे खूब होली भी खेली ...पर भांग का खयाल मन से गया नहीं था।

होली खेल कर थके-हारे हम दोस्त-यार बैठे बात ही कर रहे थे कि इतने में किसी को खबर मिली की भांग कहाँ से लाया जा सकता है। बस फिर क्या था, सारे लौंडे अपनी-अपनी फटफटी (Bike) पर सवार हो निकल लिए। जानते हो कहाँ मिला भांग? एक पान की दूकान पर ..... जो की ठीक पुलिस थाने की बगल में था!
जय हो भोलेनाथ ...तुम्हारी लीला अपरम्पार है! ;)

Tuesday, March 26, 2013

रोक सको तो रोक लो मुझको मैं तो होली मनाऊंगा।

रोज़ रोज़ की हो गई चिक-चिक, रोज़ रोज़ के नारे
कथनी-करनी में अंतर पर डींग मारते सारे
थोथे आदर्शवादियों सुनलो, जो कहता हूँ करके दिखलाऊंगा
रोक सको तो रोक लो मुझको मैं तो होली मनाऊंगा।

तुमको रहना हो तो रहो बेरंग, मैं तो अबीर उड़ाउंगा
जीवन में है कठिनाइयाँ सहस्त्र, खिल्ली उड़ाकर उन्हें निपटाऊंगा
जिन सब से थी अनबन उनको भी मैं तो गले लगाऊंगा
रोक सको तो रोक लो मुझको मैं तो होली मनाऊंगा।

पानी की किल्लत है कहते हो? मत करिए स्नान सप्ताह एक
जो ये कर पाए तुम, सम्मुख तुम्हारे नतमस्तक हो जाऊंगा
और जो न कर पाए तो फिर तुमको भी रंगों में भिगाऊंगा
रोक सको तो रोक लो मुझको मैं तो होली मनाऊंगा।

तुम मदिरा के लोभी, भांग की मादकता क्या जानोगे!
पर जो पथ काटा फिर मेरा, धतुरा तुमको चखाऊंगा।
रोक सको तो रोक लो मुझको मैं तो होली मनाऊंगा।
रोक सको तो रोक लो मुझको मैं तो होली मनाऊंगा।
- आशुतोष साहू 

'बुद्धिजीवियों' की बातों में न आयें, होली कुछ यूँ मनायें

ये देवी जी तो होली में रंगों पर ही आक्षेप(attack) कर बैठीं!
अभी कुछ ही दिन पहले महाशिवरात्रि का पर्व था। जहाँ श्रद्धालु अपने प्रिय भोलेनाथ को श्वेत पुष्प, धतुरा और दूध चढ़ा रहे थे, वहीँ दूसरी ओर लोग दूध की बर्बादी की दुहाई देते न थक रहे थे। ये नौटंकी थमी नहीं थी कि अब आई है होली की बारी और सरे बुद्धिजीवी एक स्वर में 'होली में पानी की बर्बादी' की दुहाई देने जुट गए हैं। इन सारे तथाकथित बुद्धिजीवियों से मैं पूछना चाहूँगा कि इस जीवन में जहाँ इतनी कठिनाइयां हैं, जहाँ हर मोड़ पर कोई दुःख-तकलीफ जबड़ा फाड़े खड़ा है, वहां सामान्य-जन के खुल के हंसने के मौके क्यों छीनने में लगे हो भाई? आप बात तो ऐसे कर रहे हो की अगर हम होली और दिवाली मनाना छोड़ दें तो भारत में सब को शुद्ध पेय-जल और शुद्ध वायु मुहैया हो जाएगी। आपको पानी की बर्बादी की इतनी ही चिंता है तो जल संचय के कुछ नुस्खे बता रहा हूँ। स्वयं इनका पालन करें तथा अपने परिवारजनों से भी करवाएं। और जो न कर पाएं तो आयें,हमारे साथ होली का आनंद उठाएं :

बुरा न मानो होली है! 
१- प्रातः -क्रिया में पृष्ठ-प्रच्छालन (पिछवाडा धोने) हेतु जल की जगह 'टिशु पेपर' का प्रयोग करें। जल-संचय के अलावा इसका अनुसरण करने से आप अंग्रेजों जैसे 'सभ्य' बन जायेंगे।

२-स्नान हेतु फव्वारे (शावर) का प्रयोग न कर, केवल बाल्टी के जल का प्रयोग करें।अपना स्नान एक बाल्टी पानी में निपटाने का प्रयास करें।एक बाल्टी में स्नान न हो पाए तो सप्ताह में एक-दो बार से अधिक न नहाएं।शरीर की दुर्गन्ध भगाने हेतु axe डियो तो है ही!

३- अपने वाहनों को धोने हेतु बाल्टी का प्रयोग करिए। इस क्रिया को भी एक बाल्टी में निपटाएं।

४- जिस पानी से कपडे धोये हों, उसको फेंकने की जगह उसे घर में पोछा लगाने में प्रयोग में लायें।

निम्नलिखित नुस्खों का प्रयोग मात्र एक सप्ताह  में इतना जल बचा देगा कि आप अगले एक सप्ताह तक होली खेल पाएंगे। अब तो मुस्कुरा लीजिये और आइये फागुन के गुण गाइये।

NB: और हाँ, तेल लगा कर ही होली खेलने आइयेगा, नहीं तो रंग आसानी से नहीं जायेगा। :)