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Wednesday, March 27, 2013

भांग कहाँ है ... कहाँ है भांग?

होली से ठीक एक दिन पहले मैं बाज़ार में पागलों की तरह भांग ढून्ढ रहा था। जहाँ-जहाँ मिलने की आशा थी पूछ लिया पर निराशा ही हाथ लगी। मन मार कर घर की ओर निकल लिया। 'शिकार के समय कुतिया हगाने' का यही परिणाम होता है! हमेशा काम में देरी। अब भुगतो!

पता नहीं हम महाराष्ट्र की जनता ने क्या पाप किया है कि यहाँ भांग पर रोक लगी हुई है, जबकि राजस्थान में तो सरकारी भंग की दुकानें हुआ करती हैं। आप देश की सरकार चुनने के लिए वोट तो १ ८  साल कि आयु में डाल सकते हैं परन्तु मदिरापान की अनुमति २५ वर्ष की आयु से ही मिलेगी। इस आयु-सीमा के बावजूद हर गली-नुक्कड़ पर दारु की दुकान/बार दिख जायेंगे। सरकार धूम्रपान के हर दृश्य पर 'चेतावनी' दिखाने का नियम बना सकती है परन्तु दारु-शराब पर 'हमका पीनी है' और 'गिलासी' जैसे गानों पर कोई आपत्ति नहीं।
बस रोक है तो भांग पर! बेचारा सा भांग! सरकार को मदिरा/शराब जैसे मुनाफे कमा कर नहीं दे सकता ना! बाजारवाद की इस भागमभाग में इसी कारण पिछड़ कर दूर किसी जंगल में जा बैठा है। ...बस इसी उधेड़-बुन में होलिका दहन कर मैं सो गया। आज सवेरे खूब होली भी खेली ...पर भांग का खयाल मन से गया नहीं था।

होली खेल कर थके-हारे हम दोस्त-यार बैठे बात ही कर रहे थे कि इतने में किसी को खबर मिली की भांग कहाँ से लाया जा सकता है। बस फिर क्या था, सारे लौंडे अपनी-अपनी फटफटी (Bike) पर सवार हो निकल लिए। जानते हो कहाँ मिला भांग? एक पान की दूकान पर ..... जो की ठीक पुलिस थाने की बगल में था!
जय हो भोलेनाथ ...तुम्हारी लीला अपरम्पार है! ;)

Tuesday, March 26, 2013

रोक सको तो रोक लो मुझको मैं तो होली मनाऊंगा।

रोज़ रोज़ की हो गई चिक-चिक, रोज़ रोज़ के नारे
कथनी-करनी में अंतर पर डींग मारते सारे
थोथे आदर्शवादियों सुनलो, जो कहता हूँ करके दिखलाऊंगा
रोक सको तो रोक लो मुझको मैं तो होली मनाऊंगा।

तुमको रहना हो तो रहो बेरंग, मैं तो अबीर उड़ाउंगा
जीवन में है कठिनाइयाँ सहस्त्र, खिल्ली उड़ाकर उन्हें निपटाऊंगा
जिन सब से थी अनबन उनको भी मैं तो गले लगाऊंगा
रोक सको तो रोक लो मुझको मैं तो होली मनाऊंगा।

पानी की किल्लत है कहते हो? मत करिए स्नान सप्ताह एक
जो ये कर पाए तुम, सम्मुख तुम्हारे नतमस्तक हो जाऊंगा
और जो न कर पाए तो फिर तुमको भी रंगों में भिगाऊंगा
रोक सको तो रोक लो मुझको मैं तो होली मनाऊंगा।

तुम मदिरा के लोभी, भांग की मादकता क्या जानोगे!
पर जो पथ काटा फिर मेरा, धतुरा तुमको चखाऊंगा।
रोक सको तो रोक लो मुझको मैं तो होली मनाऊंगा।
रोक सको तो रोक लो मुझको मैं तो होली मनाऊंगा।
- आशुतोष साहू 

'बुद्धिजीवियों' की बातों में न आयें, होली कुछ यूँ मनायें

ये देवी जी तो होली में रंगों पर ही आक्षेप(attack) कर बैठीं!
अभी कुछ ही दिन पहले महाशिवरात्रि का पर्व था। जहाँ श्रद्धालु अपने प्रिय भोलेनाथ को श्वेत पुष्प, धतुरा और दूध चढ़ा रहे थे, वहीँ दूसरी ओर लोग दूध की बर्बादी की दुहाई देते न थक रहे थे। ये नौटंकी थमी नहीं थी कि अब आई है होली की बारी और सरे बुद्धिजीवी एक स्वर में 'होली में पानी की बर्बादी' की दुहाई देने जुट गए हैं। इन सारे तथाकथित बुद्धिजीवियों से मैं पूछना चाहूँगा कि इस जीवन में जहाँ इतनी कठिनाइयां हैं, जहाँ हर मोड़ पर कोई दुःख-तकलीफ जबड़ा फाड़े खड़ा है, वहां सामान्य-जन के खुल के हंसने के मौके क्यों छीनने में लगे हो भाई? आप बात तो ऐसे कर रहे हो की अगर हम होली और दिवाली मनाना छोड़ दें तो भारत में सब को शुद्ध पेय-जल और शुद्ध वायु मुहैया हो जाएगी। आपको पानी की बर्बादी की इतनी ही चिंता है तो जल संचय के कुछ नुस्खे बता रहा हूँ। स्वयं इनका पालन करें तथा अपने परिवारजनों से भी करवाएं। और जो न कर पाएं तो आयें,हमारे साथ होली का आनंद उठाएं :

बुरा न मानो होली है! 
१- प्रातः -क्रिया में पृष्ठ-प्रच्छालन (पिछवाडा धोने) हेतु जल की जगह 'टिशु पेपर' का प्रयोग करें। जल-संचय के अलावा इसका अनुसरण करने से आप अंग्रेजों जैसे 'सभ्य' बन जायेंगे।

२-स्नान हेतु फव्वारे (शावर) का प्रयोग न कर, केवल बाल्टी के जल का प्रयोग करें।अपना स्नान एक बाल्टी पानी में निपटाने का प्रयास करें।एक बाल्टी में स्नान न हो पाए तो सप्ताह में एक-दो बार से अधिक न नहाएं।शरीर की दुर्गन्ध भगाने हेतु axe डियो तो है ही!

३- अपने वाहनों को धोने हेतु बाल्टी का प्रयोग करिए। इस क्रिया को भी एक बाल्टी में निपटाएं।

४- जिस पानी से कपडे धोये हों, उसको फेंकने की जगह उसे घर में पोछा लगाने में प्रयोग में लायें।

निम्नलिखित नुस्खों का प्रयोग मात्र एक सप्ताह  में इतना जल बचा देगा कि आप अगले एक सप्ताह तक होली खेल पाएंगे। अब तो मुस्कुरा लीजिये और आइये फागुन के गुण गाइये।

NB: और हाँ, तेल लगा कर ही होली खेलने आइयेगा, नहीं तो रंग आसानी से नहीं जायेगा। :)

Sunday, March 10, 2013

क्यों रोकते हो मुझे शिवरात्रि पर दूध चढाने से ?

"मैंने अपने हिस्से का दूध बचा के रखा था, उनके शब्दों में 'अन्धविश्वास के नाले' में गिराने के लिए; नही किया होता तो मेरे पेट में जाता ..... इसमें उम्मीद है आपत्ति नही होनी चाहिए किसी को .... और इन भूखों को कितने शिवलिंग पर दूध नही चढाने वालों ने दूध पिलाया है आज, ये तो मालूम नही मुझे ... आप ही बता दो मालूम हो तो"  मेरे ह्रदय की उद्द्विग्न भावनाओं को अभिव्यक्ति देते ये शब्द हैं कविवर प्रकाश 'पंकज' के। 

शिवरात्रि पर दूध की बर्बादी, शनिवार को तेल की बर्बादी, पूजा-पाठ में अक्षत के रूप में चांवल की बर्बादी, दिवाली में पटाखों से ध्वनि-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण और पैसों की बर्बादी, होली में पानी की बर्बादी ... अरे भाई साँस लेने पर भी कुछ बोल दीजिये, है तो आखिर ऑक्सीजन की बर्बादी ही न !

अगर मैं भगवन शंकर को दूध चढ़ाता हूँ तो वो इस विश्वास के साथ की प्रभु इस धरती पर सब पर कृपा करेंगे । " ॐ नमः शिवाय" मंत्र के बाद "सर्वे भवन्तु सुखिनः ..." भी कहता हूँ। मेरी प्रार्थना में वे दरिद्र-नारायण भी शामिल हैं जिनका उल्लेख आपने मेरी आस्था की आलोचना में किया था।  मेरे विश्वास को गाली देने का अधिकार किसने आपको दिया? अगर आप इतने ही आदर्शवादी हैं तो पहले जाइये उन कटती गौ माताओं को बचाइए ... जाइये ईद पर कटते बकरों को बचाइए। दिवाली से कहीं अधिक ध्वनि और वायु प्रदुषण न्यू इयर मनाने में कर जाते हैं लोग, पहले उन्हें रोकिये। वलेंटाइन डे पर फूलों, कार्डों और पैसों की बर्बादी नहीं दिखती आपको? बात यहाँ केवल आदर्शवाद की ही नहीं, अपितु असहिष्णुता की भी है ... विश्वास की भी है। केवल मेरे धार्मिक विश्वासों पर ही प्रश्नचिन्ह क्यों? 

आशा करता हूँ की आपको ये ज्ञात होगा की भीख मांगना भी एक दंडनीय अपराध है। विश्वास न हो तो ये लिंक देख लीजिये - THE BOMBAY PREVENTION OF. BEGGING ACT, 1959  क्या इसका मतलब ये नहीं की भिखारियों को भीख देना अपराध में  भागीदार होने जैसा है।अगर ये दूध मैं शिवलिंग पर न चढ़ा कर भिक्षा में किसी को दे दूं , तो क्या ये उचित होगा? क्या मैं लोगों को मेहनत की रोटी कमाना छोड़ कर भीख मांगने के लिए प्रेरित नहीं करूँगा ऐसे में? इसपर क्या कहना चाहेंगे आप?कम से कम जब में दूध खरीदता हूँ तो एक मेहनतकश दूधवाले को उसके मेहनत का फल मिलता है ... उसके परिवार का खर्च चल पाता है। आप मेहनत या भीख की रोटी में से किसे चुनना पसंद करेंगे?

मेरी आपसे करबद्ध प्रार्थना है की ये खोखला आदर्शवाद आप अपने और अपने परिवारजनों की लिए ही सम्हाल कर रखें, इससे मुझे और मेरे प्रियजनों को दूषित करने का प्रयत्न न करें। मेरे भोले-भंडारी को आपके दूध न चढाने से कोई फर्क नहीं पड़ता, अपितु अगर आप  सचमुच अपने आदर्शवाद का पालन कर हर शिवरात्रि किसी दीन-हीन के भूखे बच्चे को दूध पिलायेंगे तो मुझे पूर्ण विश्वास है की  भोले-बाबा आपसे अति प्रसन्न होंगे। तो घर बैठे आलोचना करना छोडिये और एक लोटा दूध खर्च कर आइये।

बम बम भोले ... हर हर महादेव 

Saturday, March 9, 2013

Shivoham - I am Shiva


One of my favorite stotras of all is Nirvana-shtakam. Written by Adi Shankaracharya (Adi Shankara Bhagwat Pada), it comprises of Six stanzas where Adi Shakara identifies himself with Shiva and thereby explains his Advaita (non-dualism) Philosophy.

                                    ॥ निर्वाण षटकम्॥
मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् 
न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥
I am not mind, nor intellect, nor ego, nor the reflections of inner self. I am not the five senses. I am beyond that. I am not the ether, nor the earth, nor the fire, nor the wind (i.e. the five elements). I am indeed, That eternal knowing and bliss, Shiva, love and pure consciousness.

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश:
न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥
Neither can I be termed as energy (Praana), nor five types of breath (Vaayu), nor the seven material essences (dhaatu), nor the five coverings (panca-kosha). Neither am I the five instruments of elimination, procreation, motion, grasping, or speaking. I am indeed, That eternal knowing and bliss, Shiva, love and pure consciousness.

न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥
I have no hatred or dislike, nor affiliation or liking, nor greed, nor delusion, nor pride or haughtiness, nor feelings of envy or jealousy. I have no duty (dharma), nor any money, nor any desire (refer: kama), nor even liberation (refer: moksha). I am indeed, That eternal knowing and bliss, Shiva, love and pure consciousness

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा:
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥
I have neither virtue (punya), nor vice (paapa). I do not commit sins or good deeds, nor have happiness or sorrow, pain or pleasure. I do not need mantras, holy places, scriptures, rituals or sacrifices (yajna). I am none of the triad of the observer or one who experiences, the process of observing or experiencing, or any object being observed or experienced. I am indeed, That eternal knowing and bliss, Shiva, love and pure consciousness.

न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: पिता नैव मे नैव माता न जन्म
न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥
  I do not have fear of death, as I do not have death. I have no separation from my true self, no doubt about my existence, nor have I discrimination on the basis of birth. I have no father or mother, nor did I have a birth. I am not the relative, nor the friend, nor the guru, nor the disciple. I am indeed, That eternal knowing and bliss, Shiva, love and pure consciousness.

अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥
I am all pervasive. I am without any attributes, and without any form. I have neither attachment to the world, nor to liberation. I have no wishes for anything because I am everything, everywhere, every time, always in equilibrium. I am indeed, That eternal knowing and bliss, Shiva, love and pure consciousness.