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Tuesday, October 18, 2022

महानगर में उमा-महेश के साक्षात दर्शन

मुझे महादेव और माता पारवती जहाँ-तहाँ रूप बदल-बदल कर दर्शन देते रहते हैं। कभी सवेरे पैदल सिद्धिविनायक मंदिर जाते समय भोलेनाथ फुटपाथ पर बैठे माँ पारवती के केश संवारते हुए दिख जाते हैं, तो कभी कोई मित्र शिव-पारवती की बाल गणेश के संग रेल की पटरियों के किनारे मुस्काता हुआ छायाचित्र फेसबुक पर पोस्ट कर देता है। आज माँ अन्नपूर्णा भोलेनाथ को इस व्यस्त महानगरी के एक सुस्ताए-अलसाए से रोड के किनारे जिमा रहीं थीं और भोलेनाथ चुपचाप मुस्काते हुए भोजन ग्रहण कर रहे थे। 

ना जाने कितने लंबे मार्ग इन्होंने एक दूजे की ऊँगली थामे काटे होंगे। जाने कितनी बार एक-दूजे का सहारा बने होंगे, चिलचिलाते घाम में एक-दूजे को छाया दी होगी।

पर ये तो साधारण मनुष्य ही हैं, नहीं? तो फिर ये शिव-पारवती कैसे हुए?

ब्रह्म तो हम सभी में हैं, हम सब ब्रह्म है – "अहम् ब्रह्मस्मि, तत् त्वम् असी"... पर उसका रूप जागृत तपस्या से होता है। 

पर इन्होंने कौन सी तपस्या की होगी, और मुझे कैसे पता कि तपस्या की?
दाम्पत्य अपने आप में तपस्या है। एक-दूसरे के लिए जो समर्पण भाव यौवन के "बाबू-शोना" वाले दिखावे के पश्चात् जीवन के पतझड़ में भी दिखे - बस वही वास्तविक प्रेम है और तपस्या का फल है, बाकी सब माया! जिस किसी में इस तप का दर्शन हो जाए, उसे ही मन-ही-मन उमा-महेश्वर मान कर नतमस्तक हो लो। कभी ये दर्शन सर्वसुलभ थे, आज कठिन हैं, और कल दुर्लभ हो जाएंगे।

#MyChoice #नारीवाद के समय में जब सम्बन्धों का गर्भपात सामान्य बात है, जब वामपंथी बुद्धिजीवी "विवाह संस्थागत प्रॉस्टिट्यूशन है" जैसी बातें कर लोगों की वाहवाही लूट रहे हैं, तब महादेव अपनी पार्वती को ले कर कैलाश ना जा बसेंगे तो और क्या करेंगे!
Oct 08, 2018
Fb post लिंक 

(कहानी) अर्जुन की भटकन उसे निर्जन मन्दिर ले आई

जाने किस अपरिभाषित खोज में नगर-नगर, ग्राम-ग्राम भटकटे हुए आज अर्जुन किसी सुदूर घाट पर बैठा सूर्योदय देख रहा था। अब तक मंदिर में बज रही घंटी और आरती के स्वर कब पखावज की थाप में रूपांतरित हो चुके थे ये पता ही ना चला। कहाँ से आ रही थी ये थाप?

जहाँ घाट समाप्त होता है, उसी ओर, कुछ ही दूर, पुराना सा मंदिर... और मंदिर के प्रांगण में दो मानव आकृतियाँ – दो सिल्यूएट।

मंदिर के द्वार की सीढ़ियों की एक ओर बने चबूतरे पर बैठा कोई विरल सा पुरुष मृदंग से मानो यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित करने के प्रयत्न कर रहा हो। अभी गति धीमी थी... लौह-पथ-गामिनी अपने अगले गंतव्य की ओर यात्रा प्रारंभ कर ही रही थी।

दूसरी आकृति पखावज पर पड़ते हर थाप के साथ भंगिमा बदल रही थी। सूर्योदय के लोहित आकाश की पृष्ठभूमि पर जैसे पारद शब्द उकेर रहा हो – शब्द जो क्रमबद्ध-लयबद्ध हो पंक्तियाँ रच रहे हों और पंक्तियाँ कोई कविता। 

लौह-पथ-गामिनी द्रुत गति पकड़ चुकी थी। एक ओर यज्ञकुण्ड में धधकती अग्नि की लपटें किसी स्त्री का शरीर धारण कर मंदिर के प्रांगण में नृत्याभ्यास में लीन थी, दूसरी ओर उसी अग्नि का ताप पखावज के पानों से निगर्त हो रहा था – पखावज छंदबद्ध ऋचाओं का पाठ कर रहा था। सबकुछ तरल था और हर भंगिमा उस तरल में उठती तरंगें।

दूर-दूर तक कोई और इन्हें देखने-सुनने वाला नहीं था – गाँव इस निर्जन स्थान से दूर था। संयोगवश, अपनी भटकन में आज अर्जुन ने किसी सघन वन में खिले दिव्य पुष्प के दर्शन पा लिए थे।

सम्मोहन टूटा – नृत्यांगना पखावज वादक के समक्ष शशांकासन में बिछी भारी श्वास भर रही थी। वादक बिना कोई प्रतिक्रिया दिये, चुपचाप उठ, उस जीर्ण-शीर्ण मंदिर के भीतर चला गया। सूर्य अपने रथ पर आरूढ़, दसों दिशाओं में अपनी किरणों के रजत-तंतु बिखेर चुका था।
जून ४, २०१८
शशांकासन –

Sunday, October 9, 2022

अपनी पीठ पर अपना ही हाथ

मानस में तुलसी बाबा कहते हैं–
बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोई।
जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।।
तब महादेव ने भवानी से हँसकर कहा,"न कोइ ज्ञानी है, न ही कोई मूर्ख! श्री रघुनाथजी जब जिसको जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है।"

लोकमान्यता है कि मूढ़ से मूढ़ और पतित से पतित प्राणी की जिह्वा पर भी दिन में एक बार माँ सरस्वती विराजमान होती हैं; बचपन में एक बार नानी जी के यहाँ ऐसी घटना देखी कि उस दिन से मन में ये बात घर कर गई। बड़े भइया के साथ गाँव में मॉर्निंग वॉक पर निकला था। आज भी वह दृश्य स्मृति में ज्यों का त्यों है–रेलवे स्टेशन के लोहे के पुल पर हम चल रहे थे कि वहीं किनारे में सोए एक भिखारी को भइया ने "राम राम" किया। भइया स्वयं साधुवृत्ति के हैं–गाँव में हर किसी से बड़े प्रेम से मिलते हैं। हमारे वहाँ पहुँचने के समय ही मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटा, उलझी दाढ़ी-मूँछ वाला वह व्यक्ति उठ कर बैठा ही था। भइया की राम-राम का उत्तर दे कर बोला,

"भाई, मनुज पर चार पहर तीन गुणों का पहरा रहता है। हम किस समय कैसी बात करते हैं, हमारा कैसा व्यहार होता है, ये इस पर निर्भर करता है कि हमपर कौन सा गुण भारी है।"
सवेरे के ठण्डे झोंकों ने मेरी पलकें भारी कर रखीं थीं। मैं इस ताक में था कि कब घर पहुँचूँ और बिस्तर में घुस कर फिर से सो जाऊँ। पर इस भिखारी के मुँह से ऐसी ज्ञान की बात सुनते ही नींद उड़ गई। आँखें मींच कर देखा, तो वही घिनौना सा दिखने वाला भिखारी अपनी बात को उदाहरण दे कर विस्तार दे रहा था और मैं मूढ़मति समझने के प्रयास कर रहा था। झीने से अस्पष्ट शब्द स्मरण आते हैं–

"तुमने मुझ जैसे को राम राम किया, ये सतगुन का प्रभाव है..." 

आगे की बात स्मरण नहीं। इस अधूरी बात को सोच कर लगता है जैसे नासमझी में कोई बहुत बड़ी निधि हाथों से निकल गई।

इतना सब लिखने के पीछे की बात ये रही कि अपने पहचान में सब से पतित प्राणी की कही बात ही कई बार निराशा भरे क्षणों में ढाढ़स बंधा गई–

"हम तो हनुमान जी के भक्त हैं। भले चम्मच से ही क्यों ना पहाड़ खोदना पड़े, खोदेंगे अवश्य!"

अपने ही शब्द–अपनी ही पीठ पर अपना ही हाथ। कदाचित इन्हें कहीं लिखते समय माँ सरस्वती ने मुझ जैसे कुटिल-खल-कामी पर अपनी कृपानिधि उड़ेल दी थी। फटी झोली में क्या ही समेटाता... पर इस एक स्वर्णकण को अपनी अंजुली में जब भी देखता हूँ, इतराने से चूकता नहीं मैं।
पोस्ट लिंक 

Wednesday, October 5, 2022

पूर्वजों द्वारा शक्ति उपासना का उत्सव है दशहरा

अपनी भुजाओं की मछलियों को देख कर इतराते समय मन में कहीं कोई स्वर उठता है–"इदं न मम", और मैं मुस्कुरा उठता हूँ। 

दशहरे पर आयुध पूजन करते समय ध्यान आया कि आज सामने जो कुछ सजा था – ये लेखनी मम्मी की दी हुईं... ये मुद्गर दादाजी का दिया हुआ, और ये डम्बल पापा के हैं, जिन्हें पहली बार मैं ने ११वीं कक्षा में हाथ लगाया था...

बचपन में दादाजी को देखता था–सवेरे उठ कर छत पर योगाभ्यास करते थे। एक बार उनके अखाड़े में पुराने पट्ठों के भेंट-कार्यक्रम में मुझे साथ ले गए थे। मैं उनकी उँगली पकड़े वहाँ पहुँच कर सबकुछ देखता खड़ा था। कक्षा ५वीं में पापा का स्थानांतरण मुम्बई हुआ तो नागपुर पीछे छूट गया, पर यहाँ पापा को इन्हीं डम्बल से व्यायाम करते देखा था। 

आज जो कुछ मैंने पाया है, वह तीन पीढ़ियों और उससे अधिक के परिश्रम का फल है... सारे गुण, सारी सफलता, सारे सुख! मेरा क्या? 

योग-व्यायाम और इनके द्वारा गढ़े अनुशासन–ये उन वृक्षों समान हैं जिनके बीज एक पीढ़ी बोती है और आनेवाली पीढ़ियाँ उनके फल भोगती हैं। और यही बात संस्कृति के हर रंग-अङ्ग पर लागू होती है–ऐसे ही संस्कार-परम्पराएँ गढ़ी जाती हैं। 

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

दशहरे पर आयुध-पूजन और नवरात्रि शक्ति उपासना का पर्व... और इन दोनों के ठीक पहले पितृ-पक्ष!

शक्ति उपासना बिन बलि पूरी नहीं होती।

पित्तरों के अथक परिश्रम और उनके पारिवारिक हितों हेतु वैयक्तिक सुखों का बलिदान उनकी शक्ति उपासना थी... जिसका उत्सव उनके वंशजों के जीवन की विजया-दशमी!

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