मुझे महादेव और माता पारवती जहाँ-तहाँ रूप बदल-बदल कर दर्शन देते रहते हैं। कभी सवेरे पैदल सिद्धिविनायक मंदिर जाते समय भोलेनाथ फुटपाथ पर बैठे माँ पारवती के केश संवारते हुए दिख जाते हैं, तो कभी कोई मित्र शिव-पारवती की बाल गणेश के संग रेल की पटरियों के किनारे मुस्काता हुआ छायाचित्र फेसबुक पर पोस्ट कर देता है। आज माँ अन्नपूर्णा भोलेनाथ को इस व्यस्त महानगरी के एक सुस्ताए-अलसाए से रोड के किनारे जिमा रहीं थीं और भोलेनाथ चुपचाप मुस्काते हुए भोजन ग्रहण कर रहे थे।
ना जाने कितने लंबे मार्ग इन्होंने एक दूजे की ऊँगली थामे काटे होंगे। जाने कितनी बार एक-दूजे का सहारा बने होंगे, चिलचिलाते घाम में एक-दूजे को छाया दी होगी।
पर ये तो साधारण मनुष्य ही हैं, नहीं? तो फिर ये शिव-पारवती कैसे हुए?
ब्रह्म तो हम सभी में हैं, हम सब ब्रह्म है – "अहम् ब्रह्मस्मि, तत् त्वम् असी"... पर उसका रूप जागृत तपस्या से होता है।
पर इन्होंने कौन सी तपस्या की होगी, और मुझे कैसे पता कि तपस्या की?
दाम्पत्य अपने आप में तपस्या है। एक-दूसरे के लिए जो समर्पण भाव यौवन के "बाबू-शोना" वाले दिखावे के पश्चात् जीवन के पतझड़ में भी दिखे - बस वही वास्तविक प्रेम है और तपस्या का फल है, बाकी सब माया! जिस किसी में इस तप का दर्शन हो जाए, उसे ही मन-ही-मन उमा-महेश्वर मान कर नतमस्तक हो लो। कभी ये दर्शन सर्वसुलभ थे, आज कठिन हैं, और कल दुर्लभ हो जाएंगे।
#MyChoice #नारीवाद के समय में जब सम्बन्धों का गर्भपात सामान्य बात है, जब वामपंथी बुद्धिजीवी "विवाह संस्थागत प्रॉस्टिट्यूशन है" जैसी बातें कर लोगों की वाहवाही लूट रहे हैं, तब महादेव अपनी पार्वती को ले कर कैलाश ना जा बसेंगे तो और क्या करेंगे!
Oct 08, 2018
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